गूंगी थी, उफ़ ! चिल्लाती भी तो चिल्लाती कैसे !!

सितम सहते रहे, खामोश रहे
कुछ कहा, गुनाह कर लिया !
…..
जमीं से आसमां तक, था धुंध अन्धेरा
खुशनसीबी हमारी, तुम चाँद बन के आए !
…..
खुशबू बिखर गई, गिरी पंखुड़ियों के संग
जब तक गुलाब था, क्या ढूँढते थे हम !
…..
सारी रात हम दर पे, बैठे बैठे जागते रहे
और क्या करते, तेरी नींद का ख्याल था !
…..
जब से मिले हो तुम, खुशियाँ ही मिल गईं
तिनके तिनके समेट, हमने घौंसले बना लिए !
…..
आज जो खुद को निकम्मा कह रहे हैं ‘उदय’
सच ! हम जानते हैं वो बहुत समझदार हैं !
…..
शुक्र है मिरे रक्त ने, कुछ असर तो दिखाया
चलते चलते राह में, अजनबी को हंसाया !
…..
पलकें सिहर गईं थीं, तिरे इंतज़ार में
जब आना नहीं था, फिर वादा ही क्यूं किया !
…..
कैंसे मिले थे तुम, और कैंसे बिछड़ गए
अब यादें समेट के, चला जा रहा हूँ मैं !
…..
वक्त ने क्यों, हमें इतना बदल दिया
शैतां लग रहे हैं, खुद आईने में हम !
…..
गूंगों के हाथ में सत्ता की डोर है
अंधों की मौज है, बहरों की मौज है !
…..
चले आना अब, दबे पाँव तुम ‘उदय’
नींद सी आने लगी है, इंतज़ार में !
…..
आबरू हो रही थी तार तार, सब कान सटाए बैठे थे
गूंगी थी, उफ़ ! चिल्लाती भी तो चिल्लाती कैसे !

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सच ! गुलामी में भी, ठाठ छन रही है !!

पॉलिसी, प्रीमियम, इंश्योरेंश, सब कुछ करा लिया
फिर क्लैम के लिए, मेरे सीने पे नस्तर चला दिया !
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छोड़ दिया कोई गम नहीं, अपना बनाया तो सही
तोड़ते फिरते हैं दिलों को, उन्हें कोई अफसोस नहीं !
…..
चलो फिर आज रेत का एक घरौंदा बना लें
कुछ देर ही सही, हम खुशियों को जगह दें !
…..
दे दे कर सलामी, खुश हो रहे हैं लोग
सच ! गुलामी में भी, ठाठ छन रही है !
…..
सच !मिट्टी, रेत के घरौंदे हम बनाते रहे
और उन्हें बारिश की बूंदों से बचाते रहे !
…..
तेरी
दुआओं ने सलामत रक्खा है मुझको
सच ! एक एक अदा का, कर्जदार हूँ मैं !
…..
चलो आज की सब इत्मिनान से सलाम कर लें
सफ़र में हमें, हर रोज दोचार पहर मिलना है !
…..
सच ! हम तो उसी दिन हो गए थे फना
जिस रोज तुमने हमें देख मुस्काया था !
…..
तेरी आँखों ने कहा, कुछ चाव से
सोचे बिना ही हम तेरे संग हो लिए !
…..
ठीक
है, जाओ, पर याद रखनाउदय
घर में कोई, टकटकी लगाए बैठा है !
…..
प्रेम
, विश्वास, समर्पण, खुशियों की बुनियाद हैंउदय
सच ! जिसको भी छेड़ोगे, मायूसी ही हाथ आयेगी !
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चाहत, कशिश, लम्हें और हम
चलो
कहीं बैठ के बातें कर लें !
…..
जब तक हमने पत्थर उछाले नहीं थेउदय
कैसे कह देते आसमां में सुराख हमने किये थे !

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उफ़ ! कहीं ऐसा न हो, वहां भी शैतानों की हुकूमत हो !!

मैं जब से डूबा हूँ, तेरी यादों के समुन्दर में यारा
कोई बताये भूल-भुलैय्या है, या जंतर-मंतर !
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‘उदय’ जाने, कौन बैठा है वहां, हिसाब-किताब की दुकां खोले
उफ़ ! कहीं ऐसा न हो, वहां भी शैतानों की हुकूमत हो !
…..
ऐसी चाहत किस काम की ‘उदय’
जिसे चाहें,उसे मालूम ही न हो !
…..
तुम्हें चाहना, चाहते रहना, मेरी मोहब्बत है
गर कोई खुदगर्जी कहे, तो उस पर लानत है !
…..
दुष्ट कह लो, क्या करें मजबूर हैं
नेता सभी, सत्ता के नशे में चूर हैं !
…..
उफ़ ! क्या सितम है सर्द मौसम का ‘उदय’
कुडियां सभी, बदन ढकने को हुई मजबूर हैं !
…..
चहूँ ओर है आलम मौकापरस्ती का
संजीदगी की बातें हजम नहीं होती !
…..
अब क्या करें, सरकार है चलानी तो पड़ेगी ही
कोई बताये, बिना घोटालों के चलती है क्या !
…..
ईमान, जिस्म, रंग, खुशबू, बाजार हो गए
कुछ बेचने वाले, तो कुछ खरीददार हो गए !
…..
कुछ बन गए अमीर, ईमान बेचकर
क्या हुआ जो हम गुमनाम हो गए !
…..
क्यों हम फ़िदा हुए, अंदाज पे तेरे
अब अपने वजूद को, ढूँढते हैं हम !
…..
खुशियों की चाह में, खिड़की तो खोल दी
अब कब तक रहें खड़े, तेरे इंतज़ार में !
…..
मन, आँखें, रात, हैं तेरे इंतज़ार में
अब शर्म न करो, घूंघट को डाल कर !
…..
सुबह, शाम, दिन, रात, इंतज़ार किया
अब क्या कहें, तेरा वादा, वादा ही रहा !
…..
तेरे वादे, सफ़र, और इंतज़ार मेरा
चलो कोई बात नहीं, इन्तेहा ही सही !
…..
हाँ खबर है हमको, कडा पहरा है तुझ पे
कम से कम आँखों से, सलाम कह देते !
…..
क्या गजब अंदाज-ए-मोहब्बत है ‘उदय’
उफ़ ! चाहते भी रहे, और खामोश भी रहे !
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सरकारें ! तू चोर, तू चोर, चोर चोर मौसेरे भाई !!

बफा की बातें, और बेवफाई यारा
आज का दौर है, सब चलता है !
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मन, भावनाएं, स्वप्न, कल्पनाएँ, स्वर्ग, नर्क
चलो सबको मिलाकर, रचें एक नया जहां ‘उदय’ !
…..
जीभ, आँखें, शब्द, भेद, सत्य, असत्य
अनोखा कुछ नहीं, सच ! ये जीवनचक्र है !
…..
उफ़ ! कल पढ़ा, मतदान, सबसे बड़ा दान है ‘उदय’
सोचता हूँ, देने वाला या उकसाने वाला, कौन है ज्ञानी !
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मंहगाई ! दोनों कठघरों से आवाज आई है ‘उदय’
सरकारें ! तू चोर, तू चोर, चोर चोर मौसेरे भाई !
…..

जख्म हों या मोहब्बत हो ‘उदय’
जाते जाते ! निशां छोड़ जाते हैं !
…..
कल तक ये जहां, गुमशुम सा था
तुम जो मुस्कुराए, खुशी आ गई !
…..
जब जिक्र हो स्वतंत्रता का ‘उदय’
सच ! नौकर तो गुलाम ही होते हैं !
…..
क्या हुआ, कैसे हुआ, कब हुआ, खबर नहीं
कल तक गरीब था, नेता बना अमीर हो गया !
…..
क्या हुआ, छोडो भी अब, जाने भी दो
भूल हुई, हमसे हुई, जो तुम्हें अपना कहा !
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भीड़ बढ़ती गई, बढ़ते ही चली गई ‘उदय’
हम चलते रहे, कारवां भी चलता ही रहा !
…..
अब उनका गुनाह क्या, जो खड़े हैं बाजार में
खरीददार कोई और है, बिकबाल कोई और !
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अब सोतों को, मत जगाओ ‘उदय’
उफ़ ! घर लुटता है, तो लुट जाने दो !

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सरकार और मीडिया के सम्बन्ध गुनगुने हो गए !

दुनिया की भीड़ में, कुछ उलझा हुआ था मैं
जब से मिले हो तुम, कुछ भूला हुआ हूँ मैं !
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अब तूफानों से, क्या शिकबा गिला करें
थे यादों के घोंसले, उड़ कर बिखर गए !
…..
कल सुबह जब तुम्हें, सीढ़ियों पर धूप में खड़े देखा
सच ! देखता रहा, तुम्हारे खुले केश चमचमाते हुए !
…..
सच ! तुम्हारी आँखें, बेपनाह प्यार को बयां करती हैं
इन्साफ की घड़ी है, चुप रहती हो या कुछ कहती हो !
…..
जो रहते हैं दिल में धड़कन बनकर
अब वो रूठें , तो भला कैसे रूठें !
…..
जब से देखा है तुम्हे, मदहोशी सी छाई है
तुम्हें देखते भी रहें, खुद को सम्हालें कैसे !
…..
जख्म और दर्द, होते हैं जिन्दगी के हिस्से
आये हैं तो, जाते जाते निशां छोड़ जायेंगे !
…..

कोई शिकवा, कोई शिकायत अब तुझसे रही
तुझसे मिलने के मंजर, बहुत पीछे छोड़ आया हूँ !
…..

कल तक मेरी दुनिया में अंधेरे ही अंधेरे थे
शुक्र है, आज तुम आये, उजाले हो गए !
…..
उफ़ ! ये दर्द बार बार क्यूं उभर आते हैंउदय
जो भुला चुके हैं हमें, क्यूं यादों में उतर आते हैं !
…..
एक फ़रिश्ते ने, इंसानियत की दुकां खोली थी
उफ़ ! दुकां तो खुली है, पर हैवानों का कब्जा है !
…..

कौन ठंडे और गरम में बेवजह उलझा रहताउदय
सरकार और मीडिया के सम्बन्ध गुनगुने हो गए !

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देखते हैं, कौन क्या उखाड़ लेगा !

दौलतें हाथ में हों,दिमाग दौड़ पड़ते हैं ‘उदय’
हमने गूंगों को भी देखा है, गुनगुनाते हुए !
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तिलस्मी बाजार है, मुफ्त के रत्न, पत्थर समझ लेते हैं लोग
कहीं ऐसा न हो, रत्न पड़े रहें और कौड़ियां बिक जाएं ‘उदय’ !
…..
“जाम, आम, पराग, फूल, खुशबू, जिस्म, यही जिन्दगी है
प्रेम, समर्पण, आस्था, प्रार्थना, भाईचारा, दिखाबा हुआ है !”
…..

उतनी ठंड नहीं है, इस सर्द में ‘उदय’
जितनी गर्मी होती है, सुर्ख नोटों में !

…..

लूट, लूट, लूट, घोटाले कर लूट,
देखते हैं, कौन क्या उखाड़ लेगा !
…..
उफ़ ! यार, तुमको ठीक से घोटाले करने भी नहीं आते
मिल बाँट के कर रहे हो, फिर भी बदनामी की तौमत !
…..
चलो एक काम करो, इस बार बदनामी नहीं चाहिए
एक ऐसी महा योजना बनाओ, जो सिर्फ हमें पता रहे !
…..

कुछ तो ख़ास है, टूट पड़े हैं लोग शुभकामना देने
सच ! जन्मदिन तो वो सालों से, हैं मनाते आये !
…..
तेरी खामोशी का असर, मुझ पे उतर आया है
जब से देखा है तुझे, मैं खामोश हुआ बैठा हूँ !

…..

बदल रहा था रंग, जो गिरगिट सा भीड़ में
कोई कह रहा था उसको, वो पत्रकार है !

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जतन की भूख है ऎसी, अमन को भूल जाते हैं !

पैसा बडा है, ईमान बदल दे
पर इतना भी नहीं, कुदरत को बदल दे !
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नही है खौफ बस्ती में, तेरी खुबसूरती का
खौफ है तो, तेरी कातिल अदाएँ हैं ।
…..
बडा मुश्किल है जीना, यारों के चलन में
यारों से, रकीबों के रिवाज अच्छे हैं ।
…..
कौन कहता है हिन्दू-मुस्लिम में फर्क है
नहीं है फर्क जन्मों में – नहीं है फर्क रक्तों में
फर्क है तो तेरी आँखों – तेरी बातों में फर्क है
न हिन्दू भी अलग है, न मुस्लिम भी अलग है।
…..
मिटटी के खिलौने हैं हम सब, मिटटी में ही रचते-बसते हैं
जिस दिन टूट-के बिखरेंगे, मिटटी में ही मिल जायेंगे ।
…..
फूलों में जबां तुम हो, खुशबू पे फिदा हम हैं
अकेले तुम तो क्या तुम हो, अकेले हम तो क्या हम हैं।
…..
हमें परवाह नही कि सितारे आसमां मे हों
हम तो देखते हैं आसमां ,सुकूं के लिये ।
…..
हमारी दोस्ती, ‘खुदा’ बन जाए है इच्छा
अब खुशबू अमन की, ‘खुदा’ ही बाँट सकता है ।
…..
तेरी मासुमीयत की दास्तां, कितनी सुहानी है
दिलों के कत्ल कर के भी, बडे बेखौफ बैठे हो ।
…..
दुश्मनी का अब, वक्त नही है
अमन के रास्ते मे, काँटे बहुत हैं।
…..
अभी भी वक्त है यारा, पलट के देख ले हमको
खुदा जाने, फिर कभी मौका न आयेगा ।
…..
कभी तुम रोज मिलते हो, कभी मिलते नहीं यारा
तुम्हारी ये अदाएँ भी, क्या कातिल अदाएँ हैं।
…..
छोड दूँ मैं मैकदा, क्यों सोचते हो
कौन है बाहर खडा, जो थाम लेगा।
…..
क्यूँ खफा हो, अब वफा की आस में
हम बावफा से, बेवफा अब हो गये हैं।
…..
तू तन्हा क्यों समझता है खुद को ‘उदय’
हम जानते हैं कारवाँ तेरे साथ चलता है।
…..
रोज आते हो, चले जाते हो मुझको देखकर
क्या तमन्ना है जहन में, क्यूँ बयां करते नहीं।
…..
तुम्हे फुर्सत-ही-फुर्सत है, ‘आदाब-ए-मोहब्बत’ की
हमें फुर्सत नहीं यारा, ‘सलाम-ए-मोहब्बत’ की ।
…..
कभी हम चाहते कुछ हैं, हो कुछ और जाता है
जतन की भूख है ऎसी, अमन को भूल जाते हैं ।
…..
हम जानते हैं तुम, मर कर न मर सके
हम जीते तो हैं, पर जिंदा नही हैं।
…..
पीछे पलट के देखने की फुर्सत कहाँ हमें
कदम-दर-कदम हैं मंजिलें बडी ।

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