उफ़ ! क्या करें, मौत भी इम्तिहां ले रही है !!

हमदर्दी की बातें, मौकापरस्ती का आलम है
जिधर देखो उधर, फरेब ही फरेब है ‘उदय’ !
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जिन्दगी, ठिकाने, दीपक, उजाले, जमीं, आसमां
सच ! गिलेशिकवे भुलाकर, चलो मिलकर संवारें !
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उफ़ ! मुहब्बत झूठी निकल गई
सच ! चाँद गवाह बना देखता रहा !
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किसे अपना, किसे बेगाना समझेंउदय
राजनीति है, कहाँ ईमान नजर आता है !
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काश आईना मेरा, मुझसा हो जाता
रक्त से सना मेरा, चेहरा छिपा जाता !
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गरीबी, मंहगाई, भूख, अब जीने नहीं देती
उफ़ ! क्या करें, मौत भी इम्तिहां ले रही है !
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आज आईने में देखा, खुद मेरा चेहरा बदला हुआ थाउदय
फिर पड़ोस, गाँव, शहर, विदेशी चेहरों पे यकीं कैसे करते !
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खुशियाँ बार बार मुझे निहार रही थीं
और मैं सहमा सा उन्हें देख रहा था !
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ताउम्र वह खर्चे के समय, एक एक सिक्के को रोता रहा
सुबह लाश उठाई, बिस्तर पे नोटों की चादर बिछी थी !
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पद और पैसे के लिए ईमान बेच रहे हैं
खुदगर्जी का आलम, सरेआम हो गया !
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कुछ कहते फिर रहे, फ़रिश्ते खुद कोउदय
हम जानते हैं, कल तक वो ईमान बेचते थे !
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क्या खूब, खुबसूरती समेटी गई है
सच ! तस्वीर, ख़ूबसूरत हो गई है !
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तेरी जुल्फों में जो उलझा हूँ
सच ! वक्त, ठहर सा गया है !
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तिरे आगोश में, सिमट गया हूँ मैं
ढूँढता हूँ खुद को, कहीं खो गया हूँ मैं !
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प्यार, मोहब्बत, जज्बे, जंग हो गए
सच ! चलो किसी को जीत लें हम !
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बाजार बहुत मंहगा हुआ है
चलो वहां कुछ देर घूम आएं !
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