न भी चाहेंगे, फिर भी किसी हाथ से जल जायेंगे !!

खटमल, काक्रोच, मच्छर, दीमक, मकडी, बिच्छू
हिस्से-बंटवारे में लगे हैं, लोकतंत्र असहाय हुआ है !
…..
छत चूह रही है, गरीब भीग रहे हैं
अमीरों ने बरसांती की दुकां खोली है !
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दीमक, फफूंद, जाले, बढ़ रहे हैं ‘उदय’
लोकतंत्र रूपी कोठी, घूरा हुई जा रही है !
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उफ़ ! गजब मुफलिसी, और अजब फांकापरस्ती थी
सच ! न कोई अपना, और न कोई बेगाना था ‘उदय’ !
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आज का दौर है, बहुतों के हांथों में मशालें हैं ‘उदय’
न भी चाहेंगे, फिर भी किसी हाथ से जल जायेंगे !
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सरकारी मंसूबे अमीरों की कालीन पे बिखरे पड़े हैं
कोई बात नहीं, गरीब मरता है तो मर जाने दो !
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बहता दरिया हूँ, मत रोको मुझको
जब भी चाहोगे, मुझको छू लोगे !
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बेईमानों की बस्ती में, जज्बे और जज्बातों की दुकां खुल गई
मगर अफसोस, सुबह से शाम तक, कोई खरीददार नहीं आया !
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किसानों ने खून-पसीना सींच-सींच उगाई है फसल
क्या करें, सरकार और व्यापारियों में एका हो गया !
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फर्क इतना ही है, इंसा पत्थर न हुए ‘उदय’
जज्बात मरने को तो, कब के मर चुके हैं !
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जब उत्साह, जज्बातों के टूट के झरने लगें
गिरते कणों को सहेज, उत्साह बढाया जाए !
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सात फेरे और सात कश्में, कोई सहेज के बैठा है ‘उदय’
उफ़ ! निभाने वाले, सात समुन्दर पार जा के बैठे हैं !
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तेरे आंसू, मेरे आँगन में ज़िंदा हैं आज भी
तू न सही, अब उन्हें ही देख, जी रहा हूँ मैं !
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आलू, टमाटर, प्याज की दुकां शोरूम हो गईं
उफ़ ! मोल-भाव नहीं , कीमती लेबल लगे हैं !

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