सरकार और मीडिया के सम्बन्ध गुनगुने हो गए !

दुनिया की भीड़ में, कुछ उलझा हुआ था मैं
जब से मिले हो तुम, कुछ भूला हुआ हूँ मैं !
…..

अब तूफानों से, क्या शिकबा गिला करें
थे यादों के घोंसले, उड़ कर बिखर गए !
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कल सुबह जब तुम्हें, सीढ़ियों पर धूप में खड़े देखा
सच ! देखता रहा, तुम्हारे खुले केश चमचमाते हुए !
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सच ! तुम्हारी आँखें, बेपनाह प्यार को बयां करती हैं
इन्साफ की घड़ी है, चुप रहती हो या कुछ कहती हो !
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जो रहते हैं दिल में धड़कन बनकर
अब वो रूठें , तो भला कैसे रूठें !
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जब से देखा है तुम्हे, मदहोशी सी छाई है
तुम्हें देखते भी रहें, खुद को सम्हालें कैसे !
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जख्म और दर्द, होते हैं जिन्दगी के हिस्से
आये हैं तो, जाते जाते निशां छोड़ जायेंगे !
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कोई शिकवा, कोई शिकायत अब तुझसे रही
तुझसे मिलने के मंजर, बहुत पीछे छोड़ आया हूँ !
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कल तक मेरी दुनिया में अंधेरे ही अंधेरे थे
शुक्र है, आज तुम आये, उजाले हो गए !
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उफ़ ! ये दर्द बार बार क्यूं उभर आते हैंउदय
जो भुला चुके हैं हमें, क्यूं यादों में उतर आते हैं !
…..
एक फ़रिश्ते ने, इंसानियत की दुकां खोली थी
उफ़ ! दुकां तो खुली है, पर हैवानों का कब्जा है !
…..

कौन ठंडे और गरम में बेवजह उलझा रहताउदय
सरकार और मीडिया के सम्बन्ध गुनगुने हो गए !

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