फूल कश्ती बन गये, आज तो मझधार में !

कहाँ से चले थे, कहाँ आ गये हम
हमें न मिले वो, जो कश्में भुला गये ।

…..
‘उदय’ से लगाई थी आरजू हमने
अब क्या करें वो भी हमारे इंतजार मे थे।

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चाहें तो सारी दुनिया भुला सकते हैं
न चाहें तो कैसे भुलाएँ हम तुम्हे।

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वतन की खस्ताहाली से, मतलब नहीं उनको
वतन के शिल्पी होकर, जो गददार बन बैठे।

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झौंके बन चुके हैं हम हवाओं के
तेरी आँखों को अब हमारा इंतजार क्यों है।
…..

‘उदय’ तेरी नजर को, नजर से बचाए,
जब-भी उठे नजर, तो मेरी नजर से आ मिले।
(नजर = आँखें , नजर = बुरी नजर/बुराई)
…..

उदय’ तेरी आशिकी, बडी अजीब है
जिससे भी तू मिला, उसे तन्हा ही कर गया।

…..
‘उदय’ तेरे शहर में, हसीनों का राज है
तुम भी हो बेखबर, और हम भी हैं बेखबर ।

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न चाहो उन्हे तुम, जिन्हे तुम चाहते हो
चाहना है, तो उन्हे चाहो, जो तुमको चाहते हैं।
…..
हुई आँखें नम, तेरे इंतजार में ‘उदय’
कम से कम, अब इन्हें छलकने तो न दो ।

…..

इस तरह मुँह फेर कर जाना तेरा
देखना एक दिन तुझे तडफायेगा ।

…..
वो बन गये थे रहनुमा, मुफ्त में खिलौने बाँटकर
खिलौने जान ले-लेंगें, ये सोचा नहीं था ।

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ताउम्र समेटते रहे दौलती पत्थर
मौत आई तो मिटटी ही काम आई ।

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ये सच है तूने आँखों में समुन्दर को बसा रख्खा है
कितना गहरा है, ये तो डूबकर ही बता पायेंगे ।

…..
कुछ इस तरह अंदाजे बयाँ है तेरा
जिधर देखूँ, बस तू ही तू आता है नजर।

…..
फूल कश्ती बन गये, आज तो मझधार में
जान मेरी बच गई, माँ तेरी दुआओं से।

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अगर हम चाहते तो, बन परिंदे आसमाँ में उड गये होते
जमीं की सौंधी खुशबू और तेरी चाहतों ने, हमें उडने नहीं दिया।

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खंदराओं में भटकने से , खुली जमीं का आसमाँ बेहतर
वहाँ होता सुकूं तो, हम भी आतंकी बन गये होते।

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क्यों शर्म से उठती नहीं, पलकें तुम्हारी राह पर
फिर क्यों राह तकते हो, गुजर जाने के बाद।

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कौन जाने, कब तलक, वो भटकता ही फिरे
आओ उसे हम ही बता दें ‘रास्ता-ए-मंजिलें’ ।
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सिर पे बांध के कफ़न, वो घर से निकल आया था
तूफ़ान जब ठहरे, तो लोगों ने उसे ‘खुदा’ माना था !
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अब चंद लम्हें भी, सदियों से हो चले हैं
छाने लगा है जूनून जीने का, लम्हे लम्हे में !
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चलो अच्छा हुआ जो तुम, खिड़की से नीचे उतर आये
बिना दीदार कड़कती ठंड में, शायद हम ठिठुर जाते !
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कहाँ उलझे रहें हम, मिलने बिछड़ने के फसानों में
चलो दो-चार पग मिलकर रखें, हम नए तरानों में !
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एक तेरे ही नाम से, वतन में शान है मेरी
क्या उसको मिटा कर, मुझे गुमनाम होना है !
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‘उदय’ अब तू ही बता दे, रास्ता इंसान को
खा रहे रोटी वतन की, कर रहे सौदा वतन का !

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तेरी जुबां का ईमान देखकर, तेरी आंखों से यकीं उठ चला है
कभी हां, कभी ना, अब तू ही बता, ये क्या फ़लसफ़ा है !
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न टूटा था कभी, न टूटेगा ‘उदय’
सफ़र में फ़ासले हैं, गुजर ही जायेंगे !
…..
कभी तौला – कभी मासा , अजब हैं रंग फ़ितरत के
करें खुद गल्तियां, मढें इल्जाम दूजे पे !
…..
देखना चाहते हैं हम भी, तेरी ‘इबादत’ का असर
कम से कम, इसी बहाने ‘खुदा’ के दीदार तो होंगे !
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