रिश्ते, मित्र, चाहत, और जज्बात, सब झुलस जाते हैं !

कभी अन्दर, कभी बाहर, मैं खुद को ढूँढता हूँ
जाने किस घड़ी खोया, अब मैं सोचता हूँ !
…..
गलत फहमियों की आग को भभकने मत देनाउदय
रिश्ते, मित्र, चाहत, और जज्बात, सब झुलस जाते हैं !
…..
जख्मों की नुमाईश, उफ़ ! छिपाकर रखना यारो
क्या अपने, क्या पराये, कुरेदने में सभी माहिर हैं !
…..
सर्दी, बारिश, गर्मी, भूख, गरीबी, सभी बेरहम हो रहे हैंउदय
जानवर हो या इंसान, नेस्तनाबुत मकसद हो गया है उनका !
…..
जब खामोशियों में, कुछ हासिल हुआउदय
चलो कुछ बोल देते हैं, गर रूठ गई, तब देखेंगे !

Advertisements
This entry was posted in कविता. Bookmark the permalink.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s