क्या सच, कभी गुनगुनाएगा ही नहीं !

क्या हुआ, क्यों खुद से खफा बैठे हो
छोडो, जाने दो, ये दौर भी गुजर जाएगा !
…..
कभी तुम रूठ जाते हो, कभी खामोश रहते हो
करें तो क्या करें हम, तुम कुछ, क्यों कह नहीं देते !
…..
दौलत इतनी समेट ली, कहाँ रखें समझ नहीं आता
औलादें निकल गईं निकम्मी, अब कुछ सहा नहीं जाता !
…..
चलो कोई बात नहीं, मर्जी तुम्हारी, तुम करो,न करो याद मुझे
मेरा तो हक़ है, बिना दस्तक के तुम्हारी यादों में समा जाने का !
…..
कब तलक, झूठे मुस्कुराते रहेंगे ‘उदय’
क्या सच, कभी गुनगुनाएगा ही नहीं !

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