नेताओं ने लोकतंत्र को, सरेआम कर दिया !

ईमान की बस्ती में, बेईमानों का पहरा है
कोई बाहर निकले, तो भला कैसे निकले !
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कौन जाने कब तलक, बैठना है हमको
न तुम मुद्दे पे आते हो, न खामोश होते हो !
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तेरी खामोशी का क्या मतलब समझें
जब भी देखा है, खामोश ही देखा है !
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जाने दो कोई बात नहीं, कोई अफसोस नहीं
लोकतंत्र भी क्या करे, बेईमानों का राज है !
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सुबह से शाम तक, भ्रष्टाचार के चर्चे
फिर भी मौज है, खूब कर रहे हैं खर्चे !
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अब जिन्दगी में, न कुछ आम, न ख़ास रहा
नेताओं ने लोकतंत्र को, सरेआम कर दिया !

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