बद हुए, बदनाम हुए, क्या हुआ, दौलत तो आने दो !

सच का आइना अब देखा नहीं जाता
खुदगर्ज चेहरा अब नजर आने लगा है !
…………………
चलो एक और मंदिर-मस्जिद बना लें हम
सिवाय इसके, कुछ नेकी हम कर भी नहीं सकते !
…………………
है खबर मुझको, ‘खुदा’ नाराज बैठा है
क्या करें, बिना गुनाह के रहा नहीं जाता !
…………………
चलो एक और टुकड़ा बेच दें, हम शान से ईमान का
बद हुए, बदनाम हुए, क्या हुआ, दौलत तो आने दो !
…………………
ज़िंदा भूख से तड़फते-बिलखते हैं
कोई बात नहीं, चलो फूलों से मुर्दे सजा लें !

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