हम तो सिहर जाते हैं, कमबख्त तुम्हारी याद में !

दिलों के तार जब बजने लगें, मन के घरौंदे में
समझ जाना, यही अब हमारा आशियाना है !
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गर ‘खुदा’ मिल भी जाए तो क्या फर्क
शैतान थे और हैं, शैतानियत न छोड़ेंगे !
………………………….
चलो अच्छा हुआ ठंड ने तुम्हें, मेरी याद तो दिलाई
हम तो सिहर जाते हैं, कमबख्त तुम्हारी याद में !
………………………….
वाह वाह, क्या खूब यार बना रक्खे हैं
मरने की खबर सुनकर भी खामोश बैठे हैं !
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उनका वादा था ‘खुदा खैर’ बन के आने का
हम बेख़ौफ़ बैठे थे, और वो खौफ बन के आये !

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