जज्बात

कौन मिलता है, कब मिलता है
किन हालात में मिलता है
क्या होते हैं “जज्बात” उसके
क्या हम समझते हैं !

क्यों आया है वो सामने अपने
क्या तमन्ना है दिल में उसके
क्या सोचा हमने !
क्या समझना चाहा हमने !

शायद नहीं, क्यों ?
क्योंकि हमें अपनी पडी थी

हम बोलते गये –
थोपते चले गये उस पर
कभी हंसकर, कभी मुस्कुरा कर
और कभी खामोश बनकर

क्या हम सही थे
ऎसा नहीं कि हम गलत थे !

शायद उसके “जज्बात”
हमसे बेहतर होते
इस जहां से बेहतर होते
पर हमने उसे खामोश कर दिया
वह खामोश बनकर
खडा रहा, सुनता रहा
क्या कहता, खामोश बनकर ।

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