सच ! ये कुछ और नहीं, हमारी जमा पूंजी है !!

सेठ, साहूकार, अमीर, व्यापारी, नेता, अफसर
इनकी ही जय जयकार है, मेरा भारत महान !

प्यार, दर्द, जख्म, आंसू, यादें, गम, नफ़रत
माँगने की हदें मत तोड़ो, लो हम खुद गए !

मैं जब तक मैं रहा, कुछ भी रहा
आज मेरा मुझसे कोई वास्ता नहीं !

कुढ़ना
,चिढचिढाना,उखढ़ना,बौखलाना,पिनपिनाना
उफ़ ! क्या स्टाईल होता है, खूसटलम्पट लोगों का !

हम जब तक तुम में रहे, अक्श बन कर रहे
जाने कब निकले, और कब हम हो गए !

लालिमा, चहचहाहट, हवाएं, क्या हंसी सब है
काश ! ये लम्हें, इन्हें हम कुछ देर रो पाते !

गए आवाज पर हम, जब कहो तब जायेंगे
कब कहा हम हैं अपने, और कभी कह पायेंगे !

उफ़ ! जिन्होंने खुद का जमीर बेच रक्खा हैउदय
आज उन्हें भी मौक़ा मिला है लांछन लगाने का !

जब किसी को किसी की सुननामानना नहीं
फिर बेवजह ही, चर्चावार्ता पर टाईमखोटी !

कोई कुछ भी कहे, विनम्रता हम छोड़ेंगे
सच ! ये कुछ और नहीं, हमारी जमा पूंजी है !!

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… सो गए थे, ओढ़ कर, चादर हवाओं की !!

सर्द रातें बढ़ रही थीं
शीत भी गिरने लगी थी
जर्द पत्तों को बिछा कर
हमने बिछौना कर लिया था
बदन थक कर चूर चूर
और आँखें भी निढाल थीं
आसमां में दूधिया चाँदनी
चहूँ ओर मद्दम मद्दम
रौशनी बिखरी हुई थी
एक दिव्य स्वप्न
मेरे जहन में अंकुरित था
मुझे उसके खिलने की
लालसा, और बेसब्री थी
धीरे धीरे आँखें
थकान में मुंदने लगीं
मैं जर्द पत्तों के बिछौने पर
निढाल हो पसर गया
और ओढ़ ली चादर
मैंने हवाओं की
ख़्वाब था, या हकीकत
क्या कहें
हम तो सो रहे थे
सो गए थे, ओढ़ कर
चादर हवाओं की !!

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… दुपट्टा … आँखें … चाहत … !!

… दुपट्टा …
तुम्हारा दुपट्टा, हवा के झौंके संग, सरकने लगा
नीचे, और नीचे, मेरी निगाह, थम सी गई
मैं देखता रहा, कुछ ललक थी, तुम्हें देखने की
सच, मैं देखता रहा, सरकता, तुम्हारा दुपट्टा !
… आँखें …
तुम्हारी आँखें, मादक, नशीली हुई हैं
क्या हुआ, क्या बात है, कुछ बोलो
कब तक खामोश रहोगी, बोलो कब तक
क्या मैं, मान लूं, तुम्हारी आँखों की बातें
फिर मत कहना, पूछा नहीं !
… चाहत …
तुम दौड़कर, सिमट आईं, बांहों में
मैं खामोश, खुद को, और तुम्हें, सहेजता
तुम निढाल हुईं, बिखरने लगीं, रेत सी
समेटना, संभालना पडा, तुम्हें, बांहों में
कैसे बिखरने देता, सच, चाहत जो है !

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गाँधी के वतन में, अब कोई गाँधी नहीं है !

तेरी खामोशियों का, क्या मतलब समझें
तुझे उम्मीद है, या इंतजार है ।

वक्त गुजरे, तो गुजर जाये
तेरे आने तक, इंतजार रहेगा हमको ।

आसमां तक रोशनी चाहते क्यों हो
घरों के अंधेरे तो दूर हों पहले ।

खुदा की सूरतें हैं क्या, खुदा की मूरतें हैं क्या
न तुम जाने, न हम जाने ।

अंधेरे जिन्हे रास नही आते
उनकी राहों मे रौशनी खुद-व-खुद आ जाती है।

चलो लिख दें इबारत कुछ इस तरह
जिसे पढकर रस्ते बदल जाएँ।

वो भी तन्हा रह गए, हम भी तन्हा रह गए
उनकी खामोशियाँ, भी सिसकती रह गईं।

फक्र कर पहले जमीं पर
फिर करेंगे आसमां पर।

होते हैं हालात, मौत से बदतर
जो जीते-जी मौत दिखा देते हैं।

हम जो लिख दें, तो समझ लो क्या लिखा है
तुम जो पढ लो, तो समझ लो क्या लिखा है।

दौलतें बाँधकर पीठ पर ले जायेंगे
जमीं पे गददारी के निशां छोड जायेंगे।

क्यूँ रोज उलझते-सुलझते हो मोहब्बत में
क्या हँसते-मुस्कुराते जीना खुशगवार नहीं ।

तौबा कर लेते मोहब्बत से
गर तेरे इरादे भाँप जाते हम।

चमचागिरी का दौर बेमिसाल है
चमचों-के-चमचे भी मालामाल हैं।

रोज सपनों मे तुम यूँ ही चले आते हो
कहीं ऎसा तो नहीं, सामने आने से शर्माते हो।

कदम-दर-कदम रास्ते घटते गए और फासले बढते गये
फिर हौसले बढते गये, और मंजिलें बढती गईं ।

‘खुदा’ तो है ‘खुदा’ तब तक, जब तक हम ‘खुदा’ मानें
कहाँ है फिर ‘खुदा’, जब न ‘खुदा’ मानें !

‘उदय’ जाने, अब हमारी चाहतें हैं क्या
अब तक जिसे चाहा, वही बेजुवाँ निकला।

कहां अपनी, कहां गैरों की बस्ती है
जहां देखो, वहीं पे बम धमाके हैं।

लिखते-लिखते क्या लिखा, क्या से क्या मैं हो गया
पहले जमीं , फिर आसमाँ, अब सारे जहां का हो गया।

सजा-ए-मौत दे दे, या दे दे जिंदगी
चाहे अब न ही कह दे, मगर कुछ कह तो दे।

बसा लो तुम हमें, अपने गिरेबां में
दिलों में अब, है आलम बेवफाई का।

वो मिले, मिलते रहे तन्हाई में
भीड में, फिर वो जरा घबरा गये।

आज दुआएँ भी हमारी, सुन लेगा ‘खुदा’
जमीं पे, गम के साये में, खुशी हम चाहते हैं।

तुमने हमारी दोस्ती का, क्यूं इम्तिहां लिया
तुम इम्तिहां लेते रहे, और दूरियाँ बढती रहीं।

मिट्टी के खिलौनों की दुकां, मैं अब कहां ढूंढू
बच्चों के जहन में भी, तमंच्चे-ही-तमंच्चे हैं।

मेरे अंदर ही बैठा था ‘खुदा’, मदारी बनकर
दिखा रहा था करतब, मुझे बंदर बनाकर।

कब तलक तुमको अंधेरे रास आयेंगे
झाँक लो बाहर, उजाले-ही-उजाले हैं ।

छोड के वो मैकदा, तन्हा फिर हो गया
हम दोस्त नहीं , तो दुश्मन भी नहीं थे।

हम भी करेंगे जिद, अमन के लिये
देखते हैं, तुम कितने कदम साथ चलते हो।

दिखाते हो वहाँ क्यूँ दम, जहाँ पे बम नही फटते
बच्चों के खिलौने तोडकर, क्यूँ मुस्कुराते हो।

‘मसीहे’ की तलाश में दर-दर भटकते फिरे
‘मसीहा’ जब मिला, तो अपने अन्दर ही मिला।

हो शाम ऎसी कि तन्हाई न हो
मिले जब मोहब्बत तो रुसवाई न हो।

प्यार हो, तो दूरियाँ अच्छी नहीं
दुश्मनी हो, तो फिर दोस्ती अच्छी नहीं।

सत्य के पथ पर, अब कोई राही नहीं है
गाँधी के वतन में, अब कोई गाँधी नहीं है ।

मेरी महफिल में तुम आये, आदाब करता हूँ
कटे ये शाम जन्नत सी, यही फरियाद करता हूँ ।

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प्रेम से नहीं, दरिंदों को लातों से कुचला जाए !

मुफलिसी, दुश्मनी, गम, अंधेरे, सताते रहते हैं
जब भी मिलते हैं, अकड़ के मिलते हैं, जैसे कर्जदार हूँ मैं !

बेवफाई के दौर में, वफादार कहाँ मिलते हैं ‘उदय’
एक आस थी, टूट गई, जब आज वो बेवफा निकले !

जुनून-ए-मोहब्बत, न जाने क्या गुल खिला दे
टूटे जब दिल, खुद को हिला दे, ज़माना हिला दे !

कहो तो लिख दें बेवफाई पे ‘उदय’
सुना है उन्हें वफ़ा रास आती नहीं है !

अब तो हमारी दुकां मोबाइल पर ही चलती है ‘उदय’
कोई टाईम टेबल नहीं है, जब जिसकी जैसी मर्जी !

अब किसी पे हमें ऐतबार न रहा
सच ! तन्हाई में ही गुजर करते हैं !

आज के दौर में, तरफदार कहाँ मिलते हैं
वक्त मिलता है तो, खुद पे फना हो लेते हैं !

वादों की बस्ती, आंसुओं के सैलाब में डूब गई
दिल, दिमाग, जहन से, तेरी हस्ती उजड़ गई !

घर में खोल ली है आफिस हमने
अब टेंशन घटाएं तो घटाएं कैसे !

उतार-चढ़ाव, आयेंगे, जाते जायेंगे ‘उदय’
ये इरादे हैं मेरे, जो न ठहरे हैं, न ठहरेंगे !

चलो कोई तो खुश है, इल्जाम लगा कर ‘उदय’
बदनाम करने के मंसूबों ने, सुर्ख़ियों में लाया है हमें !

उफ़ ! परवान चढ़ गए, कुर्वान हो लिए, फना हो गए
काश मौसम का मिजाज देख के, दीपक जलाए होते !

थक के बैठे हैं, वक्त कैसे गुजारा जाए
सच ! आओ किसी बच्चे को तराशा जाए !

कब तक हम होंगे खुश, देख दूजे की हस्ती-मस्ती
चलो कुछ करें, खुदी को मस्तमौला बनाया जाए !

मेरी हस्ती मिटा के, कोई खुश बहुत हुआ होगा
मरा नहीं हूँ, वतन परस्तों के जहन में ज़िंदा रहूँगा !

धूप, छाँव, खुशी, गम, तुम, हम
भुला बिसरी बातें, चलो हमदम बनें !

जज्बातों को कब तक समझाएं हम ‘उदय’
प्रेम से नहीं, दरिंदों को लातों से कुचला जाए !

रहनुमाओं की आँखें देखो, अंदाज निराले हैं
बदलता दौर है, शैतानों को पहचानें कैसे !

क्या खूब बरसी है इनायत देखो
हाथ कहीं, आँख कहीं ठहरी है !

शब्द अनमोल हैं, भाव हम समझाएं कैसे
सीधी सी लकीर है, चलना सिखाएं कैसे !

मोड़, फिर मोड़, जिन्दगी गुजर जायेगी
सच ! चलो हमदम बनें, राहें सरल कर लें !

माँ, पैर, प्रेयसी, चुंबन, नया दौर है
उफ़ ! कुछ भूल गए, कुछ सीख लिया !

डाक्टर बीमार हुआ, क्या हुआ
भ्रष्ट कीड़े ने काटा है, टीका तलाशा जाए !

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उफ़ ! क्या करें, मौत भी इम्तिहां ले रही है !!

हमदर्दी की बातें, मौकापरस्ती का आलम है
जिधर देखो उधर, फरेब ही फरेब है ‘उदय’ !
…..
जिन्दगी, ठिकाने, दीपक, उजाले, जमीं, आसमां
सच ! गिलेशिकवे भुलाकर, चलो मिलकर संवारें !
…..
उफ़ ! मुहब्बत झूठी निकल गई
सच ! चाँद गवाह बना देखता रहा !
…..
किसे अपना, किसे बेगाना समझेंउदय
राजनीति है, कहाँ ईमान नजर आता है !
…..
काश आईना मेरा, मुझसा हो जाता
रक्त से सना मेरा, चेहरा छिपा जाता !
…..
गरीबी, मंहगाई, भूख, अब जीने नहीं देती
उफ़ ! क्या करें, मौत भी इम्तिहां ले रही है !
…..
आज आईने में देखा, खुद मेरा चेहरा बदला हुआ थाउदय
फिर पड़ोस, गाँव, शहर, विदेशी चेहरों पे यकीं कैसे करते !
…..
खुशियाँ बार बार मुझे निहार रही थीं
और मैं सहमा सा उन्हें देख रहा था !
…..
ताउम्र वह खर्चे के समय, एक एक सिक्के को रोता रहा
सुबह लाश उठाई, बिस्तर पे नोटों की चादर बिछी थी !
…..
पद और पैसे के लिए ईमान बेच रहे हैं
खुदगर्जी का आलम, सरेआम हो गया !
…..
कुछ कहते फिर रहे, फ़रिश्ते खुद कोउदय
हम जानते हैं, कल तक वो ईमान बेचते थे !
…..
क्या खूब, खुबसूरती समेटी गई है
सच ! तस्वीर, ख़ूबसूरत हो गई है !
…..
तेरी जुल्फों में जो उलझा हूँ
सच ! वक्त, ठहर सा गया है !
…..
तिरे आगोश में, सिमट गया हूँ मैं
ढूँढता हूँ खुद को, कहीं खो गया हूँ मैं !
…..
प्यार, मोहब्बत, जज्बे, जंग हो गए
सच ! चलो किसी को जीत लें हम !
…..
बाजार बहुत मंहगा हुआ है
चलो वहां कुछ देर घूम आएं !
…..

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न भी चाहेंगे, फिर भी किसी हाथ से जल जायेंगे !!

खटमल, काक्रोच, मच्छर, दीमक, मकडी, बिच्छू
हिस्से-बंटवारे में लगे हैं, लोकतंत्र असहाय हुआ है !
…..
छत चूह रही है, गरीब भीग रहे हैं
अमीरों ने बरसांती की दुकां खोली है !
…..
दीमक, फफूंद, जाले, बढ़ रहे हैं ‘उदय’
लोकतंत्र रूपी कोठी, घूरा हुई जा रही है !
…..
उफ़ ! गजब मुफलिसी, और अजब फांकापरस्ती थी
सच ! न कोई अपना, और न कोई बेगाना था ‘उदय’ !
…..
आज का दौर है, बहुतों के हांथों में मशालें हैं ‘उदय’
न भी चाहेंगे, फिर भी किसी हाथ से जल जायेंगे !
…..
सरकारी मंसूबे अमीरों की कालीन पे बिखरे पड़े हैं
कोई बात नहीं, गरीब मरता है तो मर जाने दो !
…..
बहता दरिया हूँ, मत रोको मुझको
जब भी चाहोगे, मुझको छू लोगे !
…..
बेईमानों की बस्ती में, जज्बे और जज्बातों की दुकां खुल गई
मगर अफसोस, सुबह से शाम तक, कोई खरीददार नहीं आया !
…..
किसानों ने खून-पसीना सींच-सींच उगाई है फसल
क्या करें, सरकार और व्यापारियों में एका हो गया !
…..
फर्क इतना ही है, इंसा पत्थर न हुए ‘उदय’
जज्बात मरने को तो, कब के मर चुके हैं !
…..
जब उत्साह, जज्बातों के टूट के झरने लगें
गिरते कणों को सहेज, उत्साह बढाया जाए !
…..
सात फेरे और सात कश्में, कोई सहेज के बैठा है ‘उदय’
उफ़ ! निभाने वाले, सात समुन्दर पार जा के बैठे हैं !
…..
तेरे आंसू, मेरे आँगन में ज़िंदा हैं आज भी
तू न सही, अब उन्हें ही देख, जी रहा हूँ मैं !
…..
आलू, टमाटर, प्याज की दुकां शोरूम हो गईं
उफ़ ! मोल-भाव नहीं , कीमती लेबल लगे हैं !

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